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Saturday, September 25, 2010

'Peepli Live' is India's entry at Oscars

- NDFS Desk

‘Peepli Live’, the Hindi film directed by debutant director Anusha Rizvi and produced by actor Aamir Khan, will be India's official entry to this year's Academy Awards (Oscar) in the Best Foreign Language Film category.
Announcing this at a press meet here on Friday, selection committee chairman K.S. Sethumadhavan said: “Peepli Live is a reflection of India's culture and ethos, even as it highlights the burning problem-farmer suicides.” “During the selection process, Tamil movie Angadi Theru competed closely and we considered various criteria before selecting Peepli Live,” Film Federation of India president L. Suresh said. Calling Peepli Live a ‘social satire,' producer-director Ravi Kottarakara said it brought out the pain of poverty. The subtle humour, which runs throughout the film, sends across the message of social awareness in a far more effective way than a melancholic film would, he added.

The selection committee comprised 15 members, including directors S. Krishnaswamy, Jayaraj and Sekhar Das, sound recordist S.K. Srivastava, writers G. Neelakanta Reddy and C.G. Rajendra Babu, music director Gangai Amaran, and costume designer Anu Vishnu.
Five Tamil films- Singam, Madharasapattinam, Angadi Theru, Raavanan and Vinnaithandi Varuvaaya - were among the 27 films initially shortlisted. Paa, Raajneeti, My Name is Khan, 3 Idiots and Pazhassi Raja also made it to the list.

Peepli Live is about farmer suicides in the country and talks about how the media and politicians handle the issue. Anusha, the Director and Mahmood Farooqui, the film’s Co Director and Casting Director too, shared their feelings with new delhi film society blog, and wrote - “Its very nice that the film has been selected for the oscars from india, but there is a long way to go for the nomination yet. Of course its good that more people will see it now, but for us the most satisfactory thing was that people in india, especially in the hindi belt and in smaller towns enjoyed the film. No joy can be compared to that.”

Wednesday, August 18, 2010

पीपली में 'मौत की रौनक' ज़ाया नहीं गई



- प्रबुद्ध


अगर आपको पता है आपकी तस्वीर अच्छी नहीं आती और कोई बार बार आके तस्वीर खींचने की ज़िद करे तो बड़ा गुस्सा आता है। बस, इस ग़ुस्से की क़िस्म ज़रा अलग होती है। ऐसा गुस्सा जिसका पता है कि इससे शक्ल बदल नहीं जाएगी। ये फ़िल्म देखते हुए ऐसा अनगिनत बार होता है। एक टीवी पत्रकार के लिए पीपली [लाइव] देखना बुरा सपना है, सज़ा है। अच्छा है, थियेटर में अंधेरा रहता है, वर्ना हमारे प्रफ़ेशन की चीरफाड़ के दृश्यों के दौरान उभरते अट्टाहस में मेरा शामिल न होना, आसपास वालों को अजूबा दिखाई देता, सोचते कैसे बिना सेंस ऑफ़ ह्यूमर के लोग आजकल मल्टीप्लेक्स का रुख़ करने लगे हैं...अच्छा है थियेटर में अंधेरा रहता है, वर्ना ऐसी तस्वीरों के दौरान चेहरा पता नहीं कौन से भावों की तस्वीर पेश कर देता और मैं मुंह छुपाया पाया जाता। फिल्म की अंग्रेज़ी पत्रकार, नंदिता कहती है- If you can't handle it, you are in the wrong profession.फिल्म का राकेश, हो सकता है खुद अनुषा रिज़वी हों, रॉन्ग प्रफेशन में हैं, ऐसे ही किसी लम्हे में एहसास हुआ होगा और छोड़ दिया। ख़ैर, उसे छोड़ जो लपका उसे माशाअल्लाह बेहतरीन तरीक़े से कहने की काबिलियत रखती हैं। राकेश भी उसी रॉन्ग प्रफेशन में था...आज़ाद हो गया, प्रफेशन से...और ज़िंदगी से भी। एक टीवी पत्रकार जब पीपली [लाइव] देख रहा हो, तो उसे ज़्यादा हंसी नहीं आती, आ ही नहीं सकती और स्साला सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि हम शायद चाहकर भी इसकी सटीक, बेबाक समीक्षा नहीं कर पाएंगे। क्यूंकि अगर ऐसा किया तो डर है कहीं लोग प्रिंट आउट लेकर फिर से चिढ़ाने न आ धमकें। या फिर मैं कुछ ज़्यादा ही सोच रहा हूं और सच ये हो कि हम ऐसा करना नहीं चाहते, इसलिए महंगाई डायन और बकलोल करती अम्माजी की आड़ में बाक़ी सारी असलियत डकार गए। सच...क्या है, कौन जाने?
लेकिन शुक्र है कि ये फिल्म सिर्फ़ मीडिया के बारे में नहीं है। हमने व्यंग्य की ताक़त को हमेशा अनदेखा किया। किताबों में भी औऱ सिनेमा में भी। लेकिन जो बात व्यंग्य अपनी पैनी धार और चुटीले अंदाज़ में कह जाता है, उसकी बराबरी शायद सीधी कहानी कभी न कर पाए। अनुषा ने व्यंग्य की धार से बहुत सारे जाले काटे हैं। ये धार कहीं कहीं इतनी पैनी है कि दिल रोने रोने जैसा होता है। होरी महतो रोज़ाना एक 'ख़ज़ाना' खोदता है, दो जून की रोटी के वास्ते। आज़ादी के 63 साल बाद और इस कृषि प्रधान देश में जन्म लेने के 75 साल (गोदान-1936) बाद भी होरी महतो आज तमाम गांवों में मिट्टी खोद रहा है या यूं कहिए अपनी क़ब्र खुद खोद के वहीं दफ़्न हो रहा है। एक, दूसरा किसान खुदकुशी से लाख रुपये कमाना चाहता है। एक एग्रीकल्चर सेक्रेटरी, नये नवेले आइएएस अफ़सर को 'फ़ाइन दार्जिंलिंग टी' के सहारे आंखें मूंदने की घुट्टी पिला रहा है। एक डीएम, नत्था 'बहादुर' को लाल बहादुर दिला रहा है। पीपली के चुनावों में नत्था की खुदकुशी के ऐलान ने सारे समीकरणों को तोड़-मरोड़ दिया है और अद्भुत तरीक़े से बुने और फिल्माए गए सीन में एक बड़ा भाई छोटे को ख़ुदकुशी के लिए राज़ी कर रहा है। 14-15 बरस के अल्हड़ लड़के (पढ़ें-मीडिया) को ये सब बेहतरीन तमाशा नज़र आता है सो वो चीख़-चीख़कर इस स्टोरी के सारे पहलुओं पर अपनी चौकस नज़र जमाता है शायद ये सोचकर भी कि 'मौत की रौनक' ज़ाया नहीं होनी चाहिए। मौत की रौनक---प्रिंस, कुंजीलाल, सूरज और भी कुछ छितरे हुए नाम इस डायलॉग के बाद दिमाग़ में कौंध जाते हैं। ये तमाम ताम-झाम, ये मेला अगर नाकाबिल हाथों में रहा होता तो ऐसा बिखरता कि आप माथा ठोंकते पर गनीमत है कि अनुषा की मीडिया बैकग्राउंड ने फ़िल्म को साधारण से असाधारण के स्तर तक उठा दिया है।
फिल्म कई मायनों में तय समीकरण तोड़ती है। एक ऐसे सिनेमाई माहौल में जहां रिश्तों और पीआर से कास्टिंग तय होती हो, वहां अनुषा और महमूद ने किरदार चुने और बुने हैं। फिल्म का गांव कोई सेट नहीं है, बल्कि अपनी पूरी धूप-छांव, खेत खलिहान, गली, नुक्कड़, चबूतरे के साथ मौजूद गांव है। फिल्म बिना शक़ हमारे वक़्त के सबसे अहम दस्तावेज़ों में से है।
और हां, सैफ़ अली ख़ान का सालों पुराना चुंबन अगर कहीं ज़िंदा है, विद 2 बाइट्स तो यक़ीन मानिए आज हमारे वक़्त की सबसे बड़ी स्टोरी होगी। अं, अं, क्या हम किसान आत्महत्या पर किसी फ़िल्म की चर्चा कर रहे थे???

(प्रबुद्ध एक युवा टीवी पत्रकार हैं।)

Saturday, August 14, 2010

पीपली लाइवः जब स्टेज पर महमूद और दानिश थे लाइव



- विनीत कुमार


फिल्म पीपली लाइव के इस शो में इन्टर्वल के दौरान पीवीआर साकेत के पर्दे पर लुई फिलिप, बिसलरी और अलसायी हुई लड़की के साथ पल्सर के विज्ञापन नहीं आते हैं। ..और न ही एक तरफ फुफकारती हुई डंसने पर आमादा नागिन और दूसरी तरफ सुर्ख लाल पानी से भरी बोतल जिसे दिखाकर सरकार हमारे बीच चुनने के टेंशन पैदा करना चाहती है। म्यूजिक बंद करने की अपील के साथ पर्दे के आगे मंच पर माइक लिए हमारे सामने होते हैं महमूद फारुकी और दानिश हुसैन। वो हमें वो वजह बता रहे होते हैं जिससे जेब में पड़ी पूरी टिकट के वाबजूद आधी फिल्म निकल गयी थी। हमने जो समझा वो साफ तौर पर ये कि मीडिया की आलोचना और उसे कोसने की एक परंपरा तो विकसित हो चली है लेकिन डिस्ट्रीब्यूशन के निर्मम खेल की तरफ लोगों का ध्यान नहीं गया है। इस पर बात किया जाना जरुरी है, महमूद हैं तो अब बात क्या पूरी फिल्म बनायी जा सकती है, उनसे ये डिमांड रखकर। हम सिनेमा और मीडिया के कंटेंट में ही फंसे हैं जबकि डिस्ट्रीब्यूशन किस तरह कंटेंट और एडिटोरियल के आगे बेशर्मी से दांत निपोरने लग जाता है, इसे हमने महसूस किया। बहरहाल...



महमूद और दानिश फिल्म के छूट गए हिस्से को जिस तरह से बता रहे थे, वो फिल्म देखने से रत्ती भर भी कम दिलचस्प नहीं था। दोनों के लिए एक लाइन- अब तो फिल्म भी बना दी लेकिन दास्तानगोई की आदत बरकरार है, सही है हजूर। उनके ऐसा करने से हम पहली बार पीवीआर में होमली फील करते हैं, एकबारगी चारों तरफ नजरें घुमाई तो दर्जनों परिचित पत्रकार, सराय के साथी, डीयू और जेएनयू के सेमिनार दोस्त दिख गए। आप सोचिए न कि पीवीआर में दो शख्स जिसमें एक बिना माइक के ऑडिएंस से बातें कर रहा हो और किसी के खांसने तक कि आवाज न हो, कैसा लगेगा? लौंडों के अट्टाहास करने, पीवीआर इज बेसिकली फॉर कपल्स के अघोषित एजेंडे, एक-दूसरे की उंगलियों में उंगलियां फंसाकर जिंदगी की सबसे मजबूत गांठ तैयार करने की जगह अगर ये सिनेमा पर बात करने की जगह बन जाती है तो कैसा लग रहा होगा? सच पूछिए तो महमूद से लगातार मेलबाजी करके इसी किसी अलग "एक्सक्लूसिव" अनुभव के लालच में पड़कर मैं और मिहिर मार-काट मचाए जा रहे थे। एक तो अपनी लाइफ में ये पहली फिल्म रही जिसकी टिकट खुद बनानेवाला नाम पुकारकर भाग-भागकर दे रहा था और हमारी बेशर्मी तब सारी हदें पार कर जाती हैं जब हम अपनी आंखें सिर्फ महमूद पर टिकाए हैं कि देख रहें हैं न हमें, हम भी हैं। हमें अनुराग कश्यप के साथ बहसतलब का पूरा सीन याद आ गया जहां अनुराग, सिनेमा जिस राह पर चल पड़ा है, बदल नहीं सकता...ये राह लागत की नहीं डिस्ट्रीव्यूशन की है, की बात करते हैं। फिर सारी बहस इस पर कि सिनेमा समाज को बदल सकता है कि नहीं? पीपली लाइव देखने के दौरान जो नजारा हमने देखा उससे ये बात शिद्दत से महसूस की कि समाज का तो पता नहीं लेकिन कुछ जुनूनी लोग धीमी ही सही अपने जज्बातों को, ड्रीम प्लान को आंच देते रहें तो सिनेमा को तो जरुर बदल सकते हैं। इन सबके बीच अनुषा रिज़वी ( फिल्म की राइटर-डायरेक्टर) बहुत ही कूल अंदाज में पेप्सी के साथ चिल हो रही होती हैं। महमूद के मेल के हिसाब से सचमुच ये फैमिली शो था, अनुभव के स्तर पर सचमुच एक पारिवारिक आयोजन। लोग घर बनाने पर दिखाते हैं, बच्चे पैदा होने पर बुलाते हैं। उऩ्होंने फिल्म बनाने पर हम सबको बुलाया था।



इन्टर्वल के बाद फिल्म शुरु से पहले दोनों ने हमें जो कुछ बताया और जो बातें हमें याद रह गयी उसमें तीन बातें बहुत जरुरी है। पहली तो ये कि नत्था के आत्महत्या करने की योजना के बीच उनके बच्चों पर जिस किस्म के दबाव बनते हैं वो दबाव कम्युनिस्ट परिवार में पैदा होनेवाले बच्चे ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। दूसरा कि शुरुआत में तो ये फिल्म हम किसान-समस्या पर बनाने चले थे लेकिन मैं और अनुषा चूंकि मीडिया बैकग्राउंड से हैं तो फिल्म बनने पर पता चला कि अरे हमने तो मीडिया पर फिल्म बना दी। फिर हमें याद दिलाया गया वो भरोसा कि अगर आप इस फिल्म में मीडिया ट्रीटमेंट देखना चाहते हैं तो असल कहानी अभी ही शुरु होनी है। मतलब कि मैं जिस नीयत से फिल्म देखने गया था, उसकी पूरी होने की गारंटी मिल गयी।..औऱ तीसरी और सबसे जरुरी बात डिस्ट्रीब्यूशन और मल्टीप्लेक्स के बीच का कुछ-कुछ..( ये महमूद के शब्द नहीं है, बस भाव हैं)। ये कुछ-कुछ जिसके भीतर बहुत सारे झोल हैं जिसका नाम लेते ही धुरंधर लिक्खाड़ों की कलम गैराजों में चली जाती है और जुबान मौसम का हाल बयान करने लग जाते हैं। इन्टर्वल के बाद फिल्म शुरु होती है..



नत्था के घर के आजू-बाजू मीडिया, चैनल क्र्यू का जमावड़ा। आप पीपली लाइव से इन सारे 6-7 मिनट की फुटेज को अलग कर दें और सारे चैनलों को उसकी एक-एक कॉपी भेज दें। आजमा कर देखा जाए कि उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है? और हां इस क्रम में रामगोपाल वर्मा के पास एक सीडी जानी बेहद जरुरी है जिससे कि वो समझ सकें कि मीडिया की आलोचना भाषणदार स्क्रिप्ट के दम पर नहीं उसके ऑपरेशनल एटीट्यूड को बस हमारे सामने रख देने भर से हो जाती है। इस अर्थ में ये फिल्म किसी डायरेक्टर या प्रोड्यूसर से कहीं ज्यादा एक ऐसे "इन्क्वायरिंग माइंड' की फिल्म है जो सीधे तौर पर सवाल करता है कि क्यों दिखाते रहते हो ये सब? अकेले नत्था थोड़े ही आत्महत्या करेगा, करने जा रहा है..जो कर चुके उसका क्या? यहीं पर आकर फिल्म चैनल की पॉपुलिज्म संस्कृति से प्रोटीन-विटामिन निचोड़कर काउंटर पॉपुलिज्म के फार्मूले को मजबूती से पकड़ती है और नतीजा हमारे सामने है कि आज हर तीन में से दो शख्स फोन करके, चैट पर, फेसबुक स्टेटस पर यही सवाल कर रहा है कि आपने पीपली लाइव देख ली क्या? महमूद फारुकी ने हमसे दो-तीन बार कह दिया कि जब तक आप इस फिल्म को पूरी न देख लें, तब तक इस पर न लिखें। इसलिए फिल्म पर अलग से..
फिल्म खत्म होती है और हम धीरे-धीरे एग्जिट की तरफ खिसकते हैं। अनुषा, महमूद, दानिश सबके सब तैनात हैं लोगों से मिलने के लिए। एक-एक से हाथ मिलाना,गले मिलना और विदा करना। हमसे हाथ मिलाते हुए फिर एक बार-फिल्म अगली सुबह देखकर ही लिखना, ऐसे मत लिख देना। तेज बारिश के बीच मेट्रो की सीट पर धप्प से गिरने के बाद सामने एक मुस्कराहट। चेहरा जाना-पहचाना। थोड़ी यादों की वार्निश से सबकुछ अपडेट हो जाता है। वो कहते हैं- क्या फिल्म बना दी पीपली लाइव, क्या नत्था की जो समस्या है, वही आखिरी समस्या है एक किसान की? न्यूज चैनलों की आलोचना कर रहे हो तो बताओ न यार कि हम क्या करें? मालिक कहता है कि रेवेन्यू जेनेरेट करो तो हम क्या करें? फिर बीबीसी की पत्रकारिता को आहें भरकर याद करते हैं, जहां हैं वहां के प्रति अफसोस जाहिर करते हैं।...देखो न मेरे दिमाग में एक आइडिया है, आमिर को बार-बार फोन कर रहा हूं, काट दे रहा है? ओह..एक चैनल के इनपुट हेड का दर्द, वो भी आज ही के दिन मेरे हिस्से आना था। महमूद साहब, ये आपने क्या कर दिया कि जिस टीवी चैनल के इनपुट हेड हमें खबर के नाम पर बताशे बनाने और आइडियाज को चूल्हे में झोंक देने की नसीहतें दिया करते थे, वो भी आइडियाग्रस्त हो गए? आप और अनुषा टीवी में आइडियाज क्यों ठूंसना चाहते हैं? सबके सब आइडियाज के फेर में ही पड़ जाएंगे तो फिर बताशे कौन बनाएंगे?



देर रात लैप्पी स्क्रीन पर लौटने पर सौरभ द्विवेदी की फेसबुक स्टेटस पर नजर गयी। लिखा था- पीपली लाइव जरूर देखिए, प्रेमचंद की कहानी कफन जैसा ट्रैजिक सटायर है ये फिल्म, सिर्फ एक बात के सिवा, इसमें अनुषा रिजवी ने अपने एनडीटीवी संस्कारों के तले दबकर दीपक चौरसियानुमा कैरेक्टर के बहाने हिंदी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कुछ ज्यादा ही खिंचाई की है। फिल्म का अंत खासा मानीखेज है। सौरभ अपने दीपक सर नुमा कैरक्टर के बहाने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खिंचाई से थोड़े आहत हैं और एनडीटीवी का संस्कार थोड़ा परेशान करता है। काश,ये संस्कार खुद एनडीटीवी में ही बचा रह जाए और संस्कार में दबकर ही कुछ और कर जाए। आधी फिल्म और जींस की जेब में पड़ी पूरी टिकट के गुरुर में पूरी की पूरी पोस्ट लिखी जा सकती है लेकिन मिहिर देर रात जागा हुआ है, पोस्ट लिखने के बजाय ट्विटर से मन बहला रहा है, महमूद के प्रति मैं खिलाफत करना नहीं चाहता।..तो एक बार फिर पीपली लाइव समग्र देखने की तैयारी में...