
Note:
Wednesday, September 22, 2010
Planning Commission gets taste of 'Peepli Live'

Tuesday, August 17, 2010
पीपली का परजातंतर
- अमिताभ जिस तरह प्रेमचंद ने कफन में घीसू माधो के जरिये गरीबी की अमानवीयता को उजागर किया था, पीपली लाइव नत्था और बुधिया के इर्द गिर्द मचे तमाशे के जरिये समूचे चौखंभा राज में लगी दीमक पर से पर्तें हटाती है। रघुवीर यादव ने उस सीन में यादगार अभिनय किया है जब दारू पीकर बुधिया और नत्था निकलते हैं और बुधिया कहता है- सरकार आत्महत्या का पइसा देती है पइसा। कफन याद कीजिए- ठगिनी क्यों नैना झमकावे कहीं न कहीं कौध जाएगा। बैकग्राउंड में बजता इंडियन ओशन का गाना देस मेरा रंगरेज ये बाबू- बड़े धारदार लहजे में रंग बिरंगे परजातंतर की उलटबांसियों को बेनकाब करता चलता है। ये महज इत्तिफाक नहीं हो सकता कि अनुषा और महमूद की फिल्म में होरी और धनिया भी बतौर किरदार मौजूद हैं। अपनी गुरबत के गड्ढ़े में मरता होरी कहीं न कहीं पीपली लाइव को प्रेमचंद की शैली और सरोकारों से जोड़ता है। समूची फिल्म एक मार्मिक व्यंग्य है। चालू मुहावरों की कैद में फंसे हिंदी सिनेमा के कैनवस पर कुछ नये स्ट्रोक्स की कोशिश के लिए इस जोड़ी का हौसला बढ़ाना चाहिए ताकि ऐसे और लोग आगे आएं ।
आमिर खान बेहतरीन एक्टर के अलावा मार्केटिंग मैनेजर भी हैं और उन्होंने इस फिल्म को 15 अगस्त के ऐन पहले रिलीज करके आजादी की सार्थकता पर डिबेट के लिए एक मुद्दा दे दिया है। ये बात अलग है कि विदर्भ में अब उनके पोस्टर जलाए जाने की शुरुआत भी हो चुकी है और किसान अपने संघर्ष की इस सिनेमाई तस्वीर से नाराज हैं।
बहरहाल, फिल्म के बहाने चर्चाएं मीडिया (क्या सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया?) की भूमिका पर ज्य़ादा हो रही हैं। इसे मीडिया के मखौल के तौर पर देखना एकतरफा होगा। आखिर भुखमरी के कगार पर पहुंचे किसान को सूखा हैंडपंप यानी लालबहादुर (जय जवान जय किसान ?) देने वाली ब्यूरोक्रेसी पर क्या कहेंगे ? याद कीजिये हैंडपंप देनेवाला बी़डीओ नत्था और बुधिया से क्या कह कर जाता है- अबे शास्त्री जी ने बचा लिया तुझे । क्रेडिट कार्ड की तरह नत्था कार्ड की प्लानिंग करने वाली सरकार को किस खाने में रखेंगे? मीडिया चौखंभा राज का बेहद अहम हिस्सा है इस नाते सामाजिक सरोकारों पर उसकी भूमिका और नजरिये के सिलसिले में बातचीत होनी ही चाहिए और इससे मीडियावालों को भी परहेज नहीं होना चाहिए। खुद मीडिया के भीतर की संस्थाएं खबरों के चुनाव और उन्हें दिखाने के तौरतरीकों पर काफी चिंतित हैं ऐसे में अगर कोई दूसरा भी आईना दिखाये तो बुरा नहीं मानना चाहिए । हां, अतिरंजना के लिए फिल्मकारों या कहानीकारों को मीडिया अपने हिसाब से कटघरे मे खड़ा कर सकता है। ये मीडिया की कुटाई का कोई पहला मौका तो है नहीं. रामगोपाल वर्मा ने जब अमिताभ बच्चन के जरिये खबरों की रणभूमि बनाम टीआरपी की रनभूमि की डिबेट छेड़ी थी तब भी ऐसी ही चर्चा चली थी। लेकिन पीपली लाइव का व्यंग्यात्मक लहजा शायद ज्यादा चुभ रहा है। फिल्म में नत्था नहीं मरता लेकिन नत्था की कहानी को चैनलों का चारा बनाने वाला कस्बाई पत्रकार राकेश चुपचाप हलाक हो जाता है। वो भी मीडिया की कांश्नस का ही एक हिस्सा है । अब इसके बहाने पत्रकारिता के कस्बाई और महानगरीय सरोकारों पर बहस का रास्ता भी खुल सकता है जो शायद फिल्म बनाने वालों का मकसद ही न रहा हो।
(अमिताभ वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं)
Monday, August 16, 2010
पीपली लाइवः चैनल की चंडूखाना संस्कृति पर बनी फिल्म
-विनीत कुमार
पीपली लाइव "इन्क्वायरिंग माइंड" की फिल्म है। हममें से कुछ लोग जो काम सोशल एक्टिविज्म, आरटीआई, ब्लॉग्स,फेसबुक,ट्विटर के जरिए करने की कोशिश करते हैं,वो काम अनुषा रिजवी,महमूद फारुकी और उनकी टीम ने फिल्म बनाकर की है। इसलिए हम जैसे लोगों को ये फिल्म बाकी फिल्मों की तरह कैरेक्टर के स्तर पर खुद भी शामिल होने से ज्यादा निर्देशन के स्तर पर शामिल होने जैसी लगती है। फिल्म देखते हुए हमारा भरोसा पक्का होता है कि सब कुछ खत्म हो जाने के बीच भी,संभावना के बचे रहने की ताकत मौजूद है। इस ताकत से समाज का तो पता नहीं लेकिन खासकर मीडिया और सिनेमा को जरुर बदल जा सकता है। ऐसे में ये हमारे समुदाय के लोगों की बनायी गयी फिल्म है। इस फिल्म में सबसे ज्यादा इन्क्वायरिंग मीडिया को लेकर है,किसानों की आत्महत्या और कर्ज की बात इस काम के लिए एक सब्जेक्ट मुहैया कराने जैसा ही है।
फिल्म की शुरुआत जिस तरह से एक लाचार किसान परिवार के कर्ज न चुकाने, जमीन नीलाम होने की स्थिति,फिर नत्था(ओंकार दास) के आत्महत्या करने की घोषणा से होती है, उससे ये जरुर लगता है कि ये किसान समस्या पर बनी फिल्म है। लेकिन आगे चलकर कहानी का सिरा जिस तरफ मुड़ता है,उसमें ये बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि ये सिर्फ किसानों की त्रासदी और उन पर राजनीतिक तिगड़मों की फिल्म नहीं है। सच बात तो ये है कि ये फिल्म जितनी किसानों के कर्ज में दबकर मरने और आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाने की कहानी है,उससे कहीं ज्यादा बिना दिमाग के, भेड़चाल में चलनेवाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बीच से जर्नलिज्म के खत्म होने और जेनुइन पत्रकार के पिसते-मरते जाने की कहानी है। ये न्यूज चैनलों के एडीटिंग मशीन की उन संतानों पर बनायी गई फिल्म है जो बताशे चीनी के नहीं, खबरों के बनाते हैं। न्यूज चैनल्स किस तरह से अपनी मौजूदगी, गैरबाजिव दखल और अपाहिज ताकतों के दम पर पहले से बेतरतीब समाज और सिस्टम को और अधिक वाहियात और चंडूखाने की शक्ल देते हैं, फिल्म का करीब-करीब आधा हिस्सा इस बात पर फोकस है। लेकिन
मेनस्ट्रीम मीडिया( यहां पर न्यूज चैनल्स) ने इसे किसान पर बनी फिल्म बताकर इसके पूरे सेंस को फ्रैक्चर करने की कोशिश की है। वो इस फिल्म में मीडिया ऑपरेशन और ट्रीटमेंट के दिखाए जाने की बात को सिरे से पचा जाती है जिसकी बड़ी वजह है कि दुनिया की आलोचना करनेवाले चैनलों की आलोचना सिनेमा या नए माध्यम करें, ये उसे बर्दाश्त नहीं। चैनल्स इस बात को पचा नहीं सकते इसलिए वो फिल्म में मीडिया चैनल्स की बेशर्मी की बात को पचा गए। साथ ही जमकर आलोचना के लिए भी चर्चा नहीं कि तो उसकी भी बड़ी वजह है कि उनके पास ये कहने को नहीं है कि बनानेवाले को चैनल की समझ नहीं है। वो निर्देशक की बैकग्राउंड को बेहतर तरीके से जानते हैं। फिल्म "रण" (2010) की तरह तो इस फिल्म के विरोध में दिखावे के लिए ही सही पंकज पचौरी की पंचायत नहीं बैठी और न ही आशुतोष(IBN7) का रंज मिजाज खुलकर सामने आया। हां अजीत अंजुम को अपने फैसले पर जरुर अफसोस हुआ कि पहले बिना फिल्म देखे जो उऩ्होंने इसे बनानेवाले को सैल्यूट किया और फाइव स्टार दे दी,अब फेसबुक पर लिखकर भूल सुधार रहे हैं कि-बहुत से सीन जबरन ठूंसे गए हैं , ताकि टीवी चैनलों के प्रति दर्शकों के भीतर जमे गुस्से को भुनाया जा सके . दर्शक मजे भी लें और हाय - हाय भी करें . लेकिन अतिरंजित भी बहुत किया गया है । इन सबके बीच हमें हैरानी हुई एनडीटीवी इंडिया और उसके सुलझे मीडियाकर्मी विजय त्रिवेदी पर जिन्होंने पीपली लाइव को लेकर सैंकड़ों बोलते शब्दों के बीच एक बार भी मीडिया शब्द का नाम नहीं लिया। छ मिनट तो जो हमने देखा उसमें सिर्फ किसान पर बनी फिल्म पीपली लाइव स्लग आता रहा। हमें हैरानी हुई आजतक पर जिसने "सलमान को छुएंगे आमिर,वो हो जाएगा हीरा" नाम से स्पेशल स्टोरी चलायी लेकिन एक बार भी पीपीली लाइव के साथ चैनल शब्द नहीं जोड़ा( गोलमोल तरीके से मीडिया शब्द,वो भी व्ऑइस ओवर में)। न्यूज चैनलों की जब भी आलोचना की जाती है,वो इसमें मीडिया शब्द घुसेड़ देते हैं ताकि उसमें प्रिंट भी शामिल हो जाए और उन पर आलोचना का असर कम हो। ये अलग बात है कि खबर का असर में अपने चैनल का नाम चमकाने में रत्तीभर भी देर नहीं लगाते। इस पूरे मामले में पीपली लाइव फिल्म देखकर न्यूज चैनलों की जो इमेज बनती है वो इस फिल्म की कवरेज को लेकर बननेवाली इमेज से मेल खाती है। ऐसे में फिल्म के भीतर चैनल्स ट्रीटमेंट को पहले से और अधिक विश्वसनीय बनाता है। हमें अजीत अंजुम की तरह जबरदस्ती ठूंसा गया बिल्कुल भी नहीं लगता। हां ये जरुर है कि..
पीपली लाइव चैनल संस्कृति की आलोचना के लिए किसी चैनल से अपने को ऑथराइज नहीं कराती है। हां ये जरुर है कि फिल्म की जरुरत के लिए एनडीटीवी 24x7 और IBN7 का सहयोग लेती है। ये फिल्म रण की तरह विजय मलिक के इमोशनल स्पीच की बदौलत चैनल के बदल जाने का भरोसा पैदा करने की कोशिश नहीं करती है। न ही रामगोपाल वर्मा की तरह पूरब( रीतेश देशमुख) को खोज लेती है जिसके भीतर एस पी सिंह या प्रणव रॉय की मीडिया समझ फिट करने में आसानी हो। मोहनदास( 2009) का स्ट्रिंगर दिल्ली में आकर चकाचक पत्रकार हो जाता है। लेकिन ये फिल्म ट्रू जर्नलिज्म का उत्तराधिकारी चुनकर हमें देने के बजाय चैनल को कैसे बेहतर किया जाए,ये सवाल ऑडिएंस पर छोड़ देती है। इस फिल्म के मुताबिक नत्था की संभावना शहर में है लेकिन राकेश जैसे पत्रकार की संभावना कहां है,इसका जबाब कहीं नहीं है। फिल्म, ये सवाल चैनल के उन तमाम लोगों पर छोड़ देती है जिन्होंने इसे एस संवेदनशील माध्यम के बजाय चंडूखाना बनाकर छोड़ दिया है। फिल्म को लेकर जिस इन्क्वायरी माइंड की बात हमने की, चैनल को लेकर ये माइंड हमें फिल्म के भीतर राकेश( नवाजउद्दीन) नाम के कैरेक्टर में दिखाई देता है। राकेश( नवाजउद्दीन) नंदिता( मलायका शिनॉय) से जर्नलिज्म को लेकर दो मिनट से भी कम के जो संवाद हैं,अगर उस पर गौर करें तो चैनल इन्डस्ट्री पर बहुत भारी पड़ती है। ये माइंड वहीं पीप्ली में ट्रू जर्नलिज्म करते हुए मर जाता है। ऐसे में ये फिल्म मोहनदास और रण के चैनल्स से ज्यादा खतरनाक मोड़ की तरफ इशारा करती है जहां न तो दिल्लीः संभावना का शहर है और न ही कोई उत्तराधिकारी होने की गुंजाइश है। फिल्म की सबसे बड़ी मजबूती कोई विकल्प के नहीं रहने,दिखाने की है। कुमार दीपक( विशाल शर्मा) के जरिए हिन्दी चैनल की जमीनी पत्रकारिता के नाम पर जो शक्ल उभरकर सामने आती है,संभव है ये नाम गलत रख दिए गए हों लेकिन चैनल का चरित्र बिल्कुल वही है। अजीत अंजुम जिसे जबरदस्ती का ठूंसा हुआ मान रहे हैं,इस पर तर्क देने के बजाय एक औसत ऑडिएंस को एक न्यूज चैनल के नाम पर क्या और कैसी लाइनें याद आती हैं,इस पर बात हो तो नतीजा कुछ अलग नहीं होगा। नंदिता के चरित्र से जिस एलीट अंग्रेजी चैनलों का चरित्र उभरकर सामने आता है,वो राजदीप सरदेसाई की अपने घर की आलोचना से मेल खाती है। वो बार-बार नत्था के अलावे बाकी लोगों को कैमरे की फ्रेम से बाहर करवाती है। फ्रेम से बाहर किए गए लोग समाज से,खबर से हाशिए पर जाने पर की कथा है। ये अंग्रेजी जर्नलिज्म की सरोकारी पत्रकारिता है। ऐसे में ये बहस भी सिरे से खारिज हो जाती है कि ये महज हिन्दी चैनलों की आलोचना है। हां ये जरुर है कि अंग्रेजी चैनल को ज्यादा तेजतर्रार और अपब्रिंग होते दिखाया गया है। इन सबके वाबजूद जिस किसी को भी ये फिल्म चैनलों की जरुरत से ज्यादा खिंचाई जैसा मामला लग रहा है,उसकी बड़ी वजह है कि इस फिल्म ने चैनलों की पॉपुलिज्म सडांध को बताने के लिए कॉउंटर पॉपुलिज्म मेथड अपनाया। उसने उसी तरह के संवाद रचे,शब्दों का प्रयोग किया,जो कि चैनल खबरों के नाम पर किया करते हैं। चैनल को अपने ही औजारों से आप ही बेपर्द हो जाने का दर्द है।प्राइवेट न्यूज चैनलों को पिछले कुछ सालों से जो इस बात का गुरुर है कि वो देश चलाते हैं,उनमें सरकार बदलने की ताकत है,वो सब इस फिल्म में ऑपरेट होते दिखाया गया है। कई बार सचमुच पूरी मशीनरी इससे ड्राइव होती नजर आती है लेकिन जब चैनलों की हेडलाइंस खुद सलीम साहब(नसरुद्दीन शाह) की भौंहें के इशारे से बदलती हैं तो फिर खुद चैनल को अपनी सफाई में कुछ कहने के लिए नहीं बचता।
चैनल के लिए गंध मचाना एक मेटाफर की तरह इस्तेमाल होता आया है। लेकिन फिल्म में ये गंध अपने ठेठ अर्थ गंदगी फैलाने के अर्थ में दिखाई देता है। नत्था के पीपली से गायब हो जाने की खबर के बाद से मौत का जो मेला लगा था,वो सब समेटा जाने लगता है। सारे चैनल क्र्यू और उनकी ओबी वैन धूल उड़ाती चल देती है। उसके बाद गांव को लेकर फुटेज है। ये फुटेज करीब 10-12 सेकण्ड तक स्क्रीन पर मौजूद रहती है- चारो तरफ पानी की बोतलें,गंदगी,कचरे। पूरा गांव शहरी संस्कार के कूड़ों से भर जाता है।...फिल्म देखने के ठीक एक दिन पहले मैं नोएडा फिल्म सिटी की मेन गेट के बजाय बैक से इन्ट्री लेता हूं। मुझे वहां का नजारा पीपली लाइव की इस फुटेज से मेल खाती नजर आती है। बल्कि उससे कई गुना ज्यादा जायन्ट। दिल्ली या किसी शहर में जहां हम गंदगी के मामले में किसी को भी ट्रेस करके कह नहीं सकते कि ये गंदगी फैलानेवाले लोग कौन है,नोएडा फिल्म सिटी के इस कचरे की अटारी को देखकर आप बिना कुछ किए उन्हें खोज सकते हैं? बल्कि थोड़ा टाइम दें तो काले कचरे की प्रेत पैकटों को ट्रेस कर सकते हैं कि कौन किस हाउस से आया? इस तरह पूरी की पूरी फिल्म लचर व्यवस्था के लिए जिम्मेदार कौन के सवाल से जूझने और खोजने का नाटक करनेवाले चैनलों सेल्फ एसेस्मेंट मोड(MODE) की तरफ ले जाती है। अब अगर महमूद फारुकी कहते हैं कि हम फिल्म तो बनाने चले थे किसान पर लेकिन बना ली तो पता चला कि हमने तो मीडिया पर फिल्म बना - तो ऐसे में चैनल के लोग इसे एक ईमानदार स्टेटमेंट मानकर ऑडिएंस को भरमाने की जगह किसान के बजाय मीडिया एनलिसिस नजरिए से फिल्म को देखना शुरु करें तो शायद इस फर्क को समझ पाएं कि होरी महतो के मर जाने और नत्था के मरने की संभावना के बीच भी कई खबरें हैं,कई पेचीदगियां हैं।
Wednesday, August 4, 2010
'पीपली लाइव' को डरबन में अवॉर्ड
- ब्रजेश कुमार झाफिल्म 'पीपली लाइव' तो 13 अगस्त को बड़े पर्दे नजर आएगी। पर इसका असर दिखने लगा है। इसे दुनियाभर में पहचान मिल रही है। अब देखिए, दक्षिण अफ्रीका में आयोजित 31वें डरबन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म उत्सव में इसे सर्वश्रेष्ठ पहले फीचर फिल्म का खिताब दिया गया। फिल्म का निर्देशन अनुषा रिज़वी ने किया है। उनके निर्देशन में बनी यह पहली फिल्म है। दरअसल, यह फिल्म देश में हो रही किसानों की आत्महत्या और उस पर होने वाली मीडियाबाज़ी व राजनीति पर तीखा व्यंग्य है। यह पुरस्कार मिलने के बाद हर कोई बहुत उत्साहित है। निर्णायक मंडल ने फिल्म की काफी तारीफ की है। उनका कहना है कि 'पीपली लाइव' एक महत्वाकांक्षी और वास्तविक फिल्म है। यह गंभीर राजनीतिक मुद्दों को विनोदपूर्ण तरीके से उठाती है। फिल्म की कहानी दो गरीब किसानों के इर्द-गिर्द घूमती है। वे दोनों पीपली नामक गांव में रहते हैं और कर्ज में डूबे हूए हैं। इससे उनकी जमीन भी हाथ से निकलने वाली होती है, तभी एक नेता उन्हें सरकारी सहायता लेने के वास्ते आत्महत्या का सुझाव देता है। खबर तत्काल फैल जाती है। उक्त किसान मीडिया के लिए भी खास हो जाता है। यकीनन, फिल्म आपको बज्र देहाती दुनिया के साथ-साथ मीडिया की वास्तविक और अनोखी दुनिया की मनोरंजक सैर कराएगी।
Sunday, January 24, 2010
All the Best Anusha!
receive government compensation. Film’s cast includes names like Raghubir Yadav, Aamir Basheer, Shalini Vatsa, Farukh Jaffer, Omkar Das and Nawazuddin Siddiqui and Naseruddin Shah in a special appearance. Casting is the film's one of the biggest attraction. Audience would feel the power of theatre artiste selected from across the India including many of Naya Thetare of Habeeb tanveer. It will be quite refreshing to see these talented actors in a film revolving around the real life situations of rural life and modern day media. The film has been shot in Madhya Pradesh and Delhi.